बसंत का उत्सव प्रकृति का उत्सव है।
माघ महीने की शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी होती है।

रिपोर्ट :- आकांक्षा वर्मा
बाराबंकी। शरद ऋतु की विदाई के साथ ही ऋतुराज के आगमन पेड़, पोधों और प्राणियों में नवजीवन का संचार करते है। बसंत का उत्सव प्रकृति का उत्सव है। माघ महीने की शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी होती है तथा इसी दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत होती है। यह बात स्व. गोकुल प्रसाद एवं स्व. रामकुमारी सेवार्थ ट्रस्ट द्वारा गांधी भवन में बसंत पंचमी के अवसर पर सरस्वती पूजन के दौरान नगर पुरोहित पं अश्वनी कुमार मिश्र ने कही। समाजवादी चिन्तक राजनाथ शर्मा ने कहा कि बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की पूजा करने वाला व्यक्ति ज्ञानवान और विद्यावान वाला होता है। उन्होंने कहा कि बसंत ऋतु को ऋतुराज भी कहा जाता है। बसंत ऋतु हमें नई ऊर्जा, नई चेतना और नए उमंग का एहसास कराती है। इस ऋतु का सभी जीव जन्तुओं और मनुष्यों के जीवन में बड़ा ही महत्व है। समाजसेवी विनय कुमार सिंह ने कहा कि वसंत ऋतु हमारे जीवन में एक अद्भुत शक्ति लेकर आती है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इसी ऋतु में ही पुराने वर्ष का अंत होता है और नए वर्ष की शुरुआत होती है। इस ऋतु के आते ही चारों तरफ हरियाली छाने लगती है। सभी पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं। इसी स्वाभाव के कारण इस ऋतु को ऋतुराज कहा गया है। इस ऋतु का स्वागत बसंत पंचमी किया जाता है। इस मौके पर वरिष्ठ अधिवक्ता बलराम सिंह ने कहा कि बसन्त हमारी संस्कृति है। इस साझा संस्कृति की प्रतीक है।

माँ सरस्वती का सन्देश है कि ज्ञान को निर्माण में लगाओ विनाश में नहीं। उनका सन्देश मानवता को ऊर्जा देता है। कार्यक्रम का संचालन पाटेश्वरी प्रसाद ने किया। इस मौके पर प्रमुख रूप से पूर्व विधायक सरवर अली, मृत्युंजय शर्मा, हुमायूं नईम खान, सत्यवान वर्मा, जमाल नईम खान, मनीष सिंह, अशोक जायसवाल, नीरज दूबे, रंजय शर्मा, संतोष शुक्ल, सभासद अश्वनी शर्मा, दानिश सिद्दीकी एडवोकेट, राजू सिंह, विजयपाल गौतम सहित कई लोग मौजूद रहे।




