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उप राष्ट्रपति सचिवालयभारत

चौधरी चरण सिंह पुरस्कार 2024 पर उपराष्ट्रपति के संबोधन का मूल पाठ

रिपोर्ट:-शमीम 

देवियो और सज्जनो, सबसे पहले पुरस्कार विजेताओं को मेरी बधाई। चारों पुरस्कार विजेताओं ने अपने प्रामाणिक योगदान के लिए विश्वसनीयता की मुहर लगाई है। वे समाज में अच्छी तरह से जाने जाते हैं और सही कारण से जाने जाते हैं। अगर मैं आप में से हर एक के पास आऊं तो यह कह सकता हूं कि कलम को नीरजा जी से बेहतर कौन संभाल सकता है। विपरीत परिस्थितियों में मौके आये हैं पर वह प्रभावित नहीं हुई हैं । उन्होंने यथासंभव वस्तुनिष्ठता को बनाए रखा है और इसलिए वे पत्रकारों की श्रेणी में बहुत कम लोगों में से एक हैं, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जिसने अत्यंत सतर्कता के साथ कई अफ्रीकी देशों में लोकतंत्र सुनिश्चित किया है और जब मैं नीरजा जी जैसे किसी व्‍यक्तित्‍व को देखता हूं, जिन्हें यह महान सम्मान दिया गया है, तो उनका नाम देश के सबसे बेहतरीन व्यक्तियों में से एक है, एक ऐसा व्यक्तित्‍व जो पारदर्शिता, जवाबदेही, अखंडता, ग्रामीण विकास के प्रति प्रतिबद्धता, किसान के प्रति प्रतिबद्धता को समाहित करता है और अपने विचारों को व्यक्त करने में हमेशा निडर रहा है।

चौधरी चरण सिंह को महानता, राजनीतिज्ञता, दूरदर्शिता और समावेशी विकास के लिए जाना जाता है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि चौधरी चरण सिंह भारत के सबसे बड़े राज्य के पहले मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री बने।

जब लोग इस व्यक्तित्‍व के महान योगदान का मूल्यांकन करने में अदूरदर्शिता दिखाते हैं तो मन को ठेस पहुंचती है। उनके अद्भुत गुण, उनकी गहरी लगन और ग्रामीण भारत के बारे में उनका ज्ञान, ऐसे लोगों के बारे में हैं जिनके बारे में उन्‍होंने महत्‍वपूर्ण जानकारी दी है। पूरी दुनिया में लोगों ने उनकी प्रतिभा पर गंभीरता से चिंतन किया है।

और इसलिए मुझे यह उचित लगता है कि हमारे पूर्व प्रधानमंत्री पर महत्वपूर्ण शोध करने के लिए किसान ट्रस्ट को राज्यसभा फेलोशिप दी जाएगी। वह एक ऐसे धरतीपुत्र थे जो हमेशा गांव से परे, शहरी लोगों के बारे में भी सोचते थे। उनके पास भारत के बारे में एक ऐसा दृष्टिकोण था जो हमारी सभ्यतागत लोकाचार के अनुरूप था।

और इसलिए, नीरजा जी को यह पुरस्कार, लोगों का ध्यान ऐसे मुद्दों पर केंद्रित करने में सहायक होगा, जिनका महत्व किसी विशेष दिन से अधिक होता है।

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सनसनीखेज बातें करना आजकल आम बात हो गई है और सनसनीखेज बातें करना अव्यवस्था है। आपने पत्रकारिता का अनुभव किया है, लेकिन अब एक चुनौती सामने आई है, विघटनकारी तकनीकों से तिल का ताड़ बनाया जा सकता है। लोगों को अभी भी उनसे संतुष्ट होना सीखना बाकी है।

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मैं जानता हूं कि मशीन लर्निंग जैसी तकनीक तेजी से बेअसर हो सकती है, लेकिन हमें उस पर काम करना होगा।

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और इसलिए, मुझे लगता है कि यह सम्मान इस तरह से दिया गया है कि हम सभी को गर्व होना चाहिए। मैंने अभी-अभी उनकी पुस्तक ‘हॉव प्राइम‍ मिनिस्‍टर्स डिसीज़न’ के लिए उनकी सराहना की। मुझे नौवीं लोकसभा का सदस्य होने का सौभाग्य मिला। मुझे दो प्रधानमंत्रियों को बहुत करीब से देखने का अवसर मिला। श्री वी.पी. सिंह के मंत्रिपरिषद में सदस्य था और श्री चंद्रशेखर जी के मंत्रिपरिषद का सदस्य बनने से मैंने इनकार कर दिया था। मैं कह सकता हूँ कि आपने जो भी लिखा है, वह आलोचनात्मक लेकिन वस्तुनिष्ठ है, विश्लेषणात्मक लेकिन स्पष्ट, सूचनात्मक लेकिन ज्ञानवर्धक भी है और मुझे विश्वास है कि देश आपकी दूसरी पुस्तक की प्रतीक्षा कर रहा है, जो आपके द्वारा चुने गए विषय डॉ. राजेंद्र सिंह को देखते हुए आवश्यक है। हमारे देश में बहुत कम लोग हैं जिन्हें कोई टैग मिलता है, बापू लोगों से निकलने वाला टैग था। लौह पुरुष सरदार पटेल, चाचा पंडित जवाहर लाल नेहरू को भी यही टैग दिया गया था। ये टैग इतिहास द्वारा दिए जाते हैं। ये स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं। हमारे समय में डॉ. राजेंद्र सिंह को “भारत के जल पुरुष” के रूप में जाना जाता है।

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अब भारत की बात करें तो हम मानवता का छठा हिस्‍सा हैं,  हम सभी स्तरों पर एकमात्र जीवंत कार्यशील लोकतंत्र होने के कारण अद्वितीय हैं, पंचायत से संसद तक संवैधानिक रूप से संरचित हैं, लेकिन उनके काम ने इस देश के हर स्‍तर को प्रभावित किया है। मेरे अपने गांव में तालाबों का जीर्णोद्धार किया गया है, जो रिकॉर्ड के अलावा अस्तित्व में नहीं थे। बहुत पहले सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला था “एक तालाब सदैव तालाब रहता है” लेकिन यह जमीन पर कार्यान्वित नहीं हुआ। अगर दुनिया ने इस आदमी को सम्मानित किया है, अगर दुनिया ने पुरस्कारों के माध्यम से उनकी सराहना की है, तो मैग्सेसे पुरस्कार उनमें से एक है और कई अन्य हैं। लेकिन यह जमीनी हकीकत है जो सारा अंतर दिखाती है और इसलिए किसी भी मानदंड से पुरस्कार की उम्मीद और मांग सही समय पर सही आदमी को मिली है। इसे जुनून के साथ मिशन मोड में करने की जरूरत है। क्‍योंकि मुझे यकीन है कि यह विषय जलवायु परिवर्तन के रूप में हमारे सामने आने वाली खतरनाक चुनौती को भी प्रभावित करेगा।

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अब कृषि एक ऐसा क्षेत्र है जिसके संबंध में मैंने चौधरी चरण सिंह जी के लेखन से बहुत कुछ सीखा है। देश का उपराष्ट्रपति बनने के बाद और भी अधिक क्योंकि जब मुझे प्रधानमंत्री ने किसान पुत्र के रूप में परिभाषित किया था, तो मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि उन्होंने आपको किसान नहीं कहा है, किसान का बेटा कहा है। इसका मतलब आप किसान नहीं हैं। किसान के बारे में आपको जानकारी नहीं है और कहा गया है कि मैं इस बात को सही तरीके से करता हूं क्योंकि ये किसान के बारे में सबसे ज्यादा काम करता है

मैं आपसे और हमारे बहुत ही प्रतिष्ठित व्यक्ति प्रीतम जी से भी आग्रह करूंगा,

कृषि ग्रामीण विकास की रीढ़ है। जब तक कृषि का विकास नहीं होगा, ग्रामीण परिदृश्य नहीं बदल सकता और जब तक ग्रामीण परिदृश्य नहीं बदलेगा, हम विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा नहीं कर सकते। निस्संदेह, इस समय भारत पहले से कहीं अधिक उन्नति कर रहा है। निस्संदेह, हमारी आर्थिक उन्नति तेजी से हो रही है, निस्संदेह, हमारी अर्थव्यवस्था फल-फूल रही है।

हम इस समय विश्व में पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था हैं, जो कठिन मार्गों से गुज़र रहे हैं और राष्ट्रीय और वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हम अब जापान और जर्मनी से आगे तीसरे स्थान पर पहुंचने की राह पर हैं, लेकिन विकसित राष्ट्र बनना, जो अब एक स्‍वप्‍न नहीं है, बल्कि हमारे लिए एक लक्ष्य है, इसके लिए 2047 में हमारी आय को आठ गुना बढ़ाना होगा।

यह एक कठिन चुनौती है और इस चुनौती का समाधान तभी हो सकता है जब गांव की अर्थव्यवस्था में सुधार हो और गांव की अर्थव्यवस्था तभी बेहतर हो सकती है जब किसान, किसान का परिवार, उपज के विपणन, उस उपज के मूल्य संवर्धन और हर जगह क्लस्टर बनाने में शामिल हो, ताकि वे उपयोग के मामले में आत्मनिर्भर बन सकें। अभी हमारे पास सबसे बड़ा बाजार कृषि उपज के संबंध में है, लेकिन कृषक समुदाय शायद ही इससे जुड़े हों।

और दूसरी बात, उद्योग कृषि उत्पादों पर उनके मूल्य संवर्धन द्वारा चलते हैं। इसमें कृषक समुदाय शामिल नहीं होते। उदाहरण के लिए दूध को ही लें। किसान इसे बेच देता है, इसमें मूल्य संवर्धन नहीं करता और इसे दही या छाछ में डालकर कुछ मूल्य जोड़ता है।

हम यह नहीं सोचते कि आइसक्रीम क्यों नहीं? अन्य चीजें क्यों नहीं? हमारी मेज पर मौजूद दैनिक उपभोग की सभी वस्तुओं को देखें। अगर खेत में कुछ होता है, तो यह उल्लेखनीय होगा। अब, कृषि क्षेत्र को किसी भी सरकार को इस तरह से देखना होगा कि यह एक प्राथमिकता वाला क्षेत्र है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो आर्थिक विकास लाता है। यह आपके घर के पास ही रोजगार का सृजन करता है।

और इसलिए, यह डॉ. फिरोज, प्रीतम जी जैसे लोगों का विषय होना चाहिए, हमें यह करना होगा। अगर हम दूध और दूध से बने उत्पादों की बात करें, तो किसान पनीर, आइसक्रीम से बहुत दूर है। जब कई अन्य उत्पादों की बात आती है, तो मुझे यकीन है कि उद्योग को इसका ध्यान रखना चाहिए, माननीय मंत्री जी यहां उपस्थित हैं।

गांव की आत्मनिर्भरता गांव या गांवों के समूह द्वारा उत्पन्न की जानी चाहिए, क्‍योंकि यह एक व्‍यापक क्षेत्र है। इसलिए जिन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, वे हमारे कल्याण, हमारी प्रसन्‍नता, हमारी सामाजिक सद्भावना, हमारी स्थिरता से संबंधित हैं और इसलिए इस तरह के पुरस्कारों का स्वागत है।

ये पुरस्कार सिर्फ़ पुरस्कार के लिए नहीं दिए गए हैं। ये पुरस्कार किसी को प्रतिष्ठित दर्जा देने के लिए नहीं दिए गए हैं बल्कि ये पुरस्‍कार हमारे देश की कुछ समस्याजनक स्थितियों से निपटने में उनके उत्‍कृष्‍ट कार्य के लिए दिए गए हैं। इन पुरस्कारों की सबसे अनूठी और अच्छी बात ये है कि ये पुरस्कार ऐसे लोगों को दिए गए हैं जिनकी विश्वसनीयता सबसे ज़्यादा है, जिनके योगदान के बारे में लोगों को पता है। इसलिए मैं सभी पुरस्कार विजेताओं को बधाई देता हूं और उनमें से हर एक का अलग से साक्षात्कार संसद टीवी द्वारा उनकी सुविधानुसार लिया जाएगा और ये अगले चार सप्ताह में होगा। ताकि आप अपने विचार आम लोगों, सांसदों, विधायकों, कृषि-अर्थशास्त्रियों तक पहुंचा सकें। मुझे विचार करने का अवसर मिला और मैं विशेष रूप से डॉ. फिरोज हुसैन जी और प्रीतम जी का उल्लेख कर रहा हूँ।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि अर्थव्यवस्था के हर संभव चरण में देश भर में इसके लगभग 180 संगठन हैं। इन संस्थाओं को वास्तविक गतिविधि में उत्प्रेरित करने की आवश्यकता है। माननीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इन्हें उच्च गति पर लाने का बीड़ा उठाया है। मैंने बदलाव देखा है, बदलाव हो रहा है।

मैं 25 और 26 दिसंबर को दक्षिण के एक राज्य में जा रहा हूँ और मुझे एक अलग ही अनुभूति हो रही है, माननीय मंत्री जी का प्रभाव तो महसूस हो ही रहा है, लेकिन आप जैसे लोग अगर वहां जाएंगे और अपना ऑडिट करेंगे तो सबके लिए यह एक चेतावनी के तौर पर होगा, पानी के लिए भी यही बात है। आपने जो क्षेत्र चुने हैं, वे वास्तव में चौधरी चरण सिंह जी की सोच को एक बहुत बड़ी श्रद्धांजलि हैं।

इन पुरस्कारों को समय के साथ इस तरह से संरचित किया जाना चाहिए कि भावी पीढ़ी आत्मनिर्भर बन सकें। अपने ट्रस्‍ट की संरचना का एक कदम आपने उठाया है। दूसरा यह है कि इसे वित्तीय रूप से मजबूत किया जाना चाहिए। कामकाज में उदारता के लिए वित्तीय मजबूती बहुत जरूरी है, अन्यथा हमें बाधाओं का सामना करना पड़ेगा।

मैं अपने स्तर पर ट्रस्टियों के साथ संपर्क में रहूंगा, इसके अलावा जो भी व्यक्ति ग्रामीण भारत के कल्याण, किसानों के कल्याण के बारे में दिल से सोचता है, चाहे वह कॉरपोरेट से हो, बुद्धिजीवियों से हो या किसी अन्य क्षेत्र से हो, उसे इस तरह के ट्रस्ट को विकसित करने के लिए आगे आना चाहिए, क्योंकि लंबे समय तक हमें दूसरा चौधरी चरण सिंह नहीं मिलेगा।

चौधरी साहब की भावना को ध्यान में रखते हुए मैंने अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है कि अभिव्यक्ति और संवाद ही लोकतंत्र को परिभाषित करते हैं। कोई राष्ट्र कितना लोकतांत्रिक हो, यह उसके व्यक्तियों और संगठनों की अभिव्यक्ति की स्थिति से निर्धारित होता है और कोई सरकार कितनी उत्तरदायी है, यह उसके संवाद की प्रकृति से निर्धारित होता है, लेकिन किसी भी लोकतंत्र की सफलता के लिए अभिव्यक्ति और संवाद दोनों ही पक्षों को बहुत जिम्मेदारी के साथ मिलकर चलना चाहिए।

मैं इस अवसर पर ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा लेकिन एक विचार आपके समक्ष रख रहा हूं,

यह समय है कि हर विचारशील भारतीय अपने दिमाग को खंगाले और उन सभी लोगों के प्रति जवाबदेही की गहरी भावना जगाएं, जो दायित्वों से बंधे हैं वे कोई गलती न करें क्‍योंकि  मैं सांसदों की बात कर रहा हूं। हमारी स्वतंत्रता और भारतीय संविधान को अपनाने की सदी के अंतिम चौथाई हिस्से में, मुझे जिस तरह का नजारा देखने को मिला है, वह चिंता का विषय होना चाहिए। मुझे लगता है कि चारों ओर कोई चिंता नहीं है। लोगों ने अव्यवस्था को व्यवस्था के रूप में लेना सीख लिया है। घृणा की कोई भावना नहीं है।

मैं उम्मीद करता हूं लोगों की कलम चलेगी, लोगों के विचार लेंगे, लोग मजबूर करेंगे की आप सोचिए आप क्यों गए थे वहां ?

मैं इसी विचार के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूं।

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