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घरेलू कोयले की सुचारु आवाजाही के लिए रेल-समुद्र-रेल परिवहन को बढ़ावा देने की पहल।

आरएसआर-कोयला निकालने का एक वैकल्पिक तरीका जिसका उद्देश्‍य निरंतर और निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना।

 

रिपोर्ट :- शिवा वर्मा (संपादक)

आरएसआर अंतिम उपयोगकर्ताओं के लिए लागत कम करता है और पर्यावरण के अनुकूल है।

कोयला मंत्रालय ने रेल-समुद्र-रेल को बढ़ावा देने के लिए एक पहल की है जिसका उद्देश्य घरेलू कोयले की सुचारु आवाजाही के लिए रेल-समुद्र-रेल (आरएसआर) परिवहन को जोड़ना है। यह मल्टीमॉडल परिवहन प्रणाली खदानों से बंदरगाहों तक और फिर अंतिम उपयोगकर्ताओं तक कोयले की निरंतर आपूर्ति की अनुमति देती है, जिससे परिवहन लागत कम होती है और लॉजिस्टिक दक्षता में सुधार होता है।

वित्त वर्ष 23 में, कुल घरेलू कच्चा कोयला भेजने का लगभग 75 प्रतिशत मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों के साथ-साथ ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों का था। कोयला उत्पादन में वृद्धि की आवश्यकता को पहचानते हुए, कोयला मंत्रालय ने वित्त वर्ष 30 तक 7.7 प्रतिशत सीएजीआर के साथ भारत में कोयला उत्पादन लगभग दोगुना होने का अनुमान लगाया है।

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बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सुनियोजित एवं कुशल कोयला निकासी प्रणाली की आवश्यकता है। इसलिए, कोयला मंत्रालय ने देश में कोयला की आवाजाही के लिए एक दीर्घकालिक योजना तैयार करने के उद्देश्य से एएस, कोयला की अध्यक्षता में बिजली मंत्रालय, रेल मंत्रालय और पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय को शामिल कर अंतर-मंत्रालयी समिति (आईएमसी) का गठन किया है। वर्तमान में कोयला निकालने में रेलवे की हिस्सेदारी लगभग 55 प्रतिशत है। इस हिस्सेदारी को वित्त वर्ष 2030 तक बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने का लक्ष्य है। वित्त वर्ष 2030 तक कोयला मंत्रालय आरएस/आरएसआर मोड जैसी भीड़ से बचने के लिए कोयला निकासी को बढ़ाने और निकासी के वैकल्पिक मार्गों को बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दे रहा है। समिति ने 2030 तक कोयले की आरएसआर निकासी को मौजूदा 40 मीट्रिक टन से बढ़ाकर 112 मीट्रिक टन तक पहुंचाने के लिए कई उपायों की सिफारिश की है। यह रणनीति बहुआयामी लाभ प्रदान करती है। सबसे पहले, कोयला निकासी का एक अतिरिक्त वैकल्पिक तरीका प्रदान करके समूचे रेल मार्ग पर भीड़भाड़ कम होने की संभावना है। दूसरे, यह बुनियादी ढांचे का निर्माण करके निर्यात के अवसर पैदा करता है जिसका उपयोग भविष्य में निर्यात के लिए किया जा सकता है और अंत में, आरएसआर में एआरआर की तुलना में कार्बन उत्सर्जन काफी कम है।

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माल ले जाने के लिए पोत परिवहन की किफायती और पर्यावरण-अनुकूल तटीय परिवहन प्रणाली भारत के लॉजिस्टिक्स उद्योग में क्रांति लाने की क्षमता रखती है। कोयला निकासी बढ़ाने के लिए चल रहे आरएस/आरएसआर जैसे प्रयास, दक्षिणी और पश्चिमी तटों के साथ बंदरगाहों की पूर्ण क्षमता उपयोग प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इससे गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में बिजली घरों तक अधिक कोयले का कुशल परिवहन हो सकेगा। आरएसआर के माध्यम से कोयला पहुंचाने की लागत में सुधार लाने की पहल चल रही है। रेल-समुद्र-रेल का विकल्प चुनने से दक्षिणी भारत में स्थित अंतिम उपयोगकर्ताओं के लिए लॉजिस्टिक्‍स की लागत में प्रति टन लगभग 760-1300 रुपये की बचत होने की संभावना है। वर्तमान में, एमसीएल (पारादीप) से पश्चिमी/उत्तरी टीपीपी तक कोयले की आपूर्ति के लिए कुल लागत एआरआर से लगभग 2500 रुपये प्रति टन बढ़ जाती है, लेकिन फिर भी यह आयातित कोयले की कुल लागत से सस्ता है।

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रेल-समुद्र-रेल को बढ़ावा देने के कोयला मंत्रालय के प्रयासों के महत्वपूर्ण परिणाम मिल रहे हैं क्योंकि पिछले चार वर्षों में कोयले के रेल-समुद्र-रेल परिवहन में लगभग 125 प्रतिशत की महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। भारत में कोयला उत्पादन के अगले सात वर्षों में लगभग दोगुना होने की उम्मीद है, परिवहन के वैकल्पिक साधन के रूप में रेल-समुद्र-रेल, भारत में उपभोग केंद्रों तक कुशल कोयला निकासी के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है, जिससे निरंतर और निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित होती है।

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आईएमसी की सिफारिशें सभी मंत्रालयों द्वारा गंतव्य स्थलों तक कोयले की सफल निकासी की चुनौतियों का समाधान करने के लिए “संपूर्ण सरकार” दृष्टिकोण का हिस्सा हैं।

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कोयला मंत्रालय एक लचीली और कुशल ऊर्जा आपूर्ति प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए देश की बढ़ती ऊर्जा मांगों को लगातार पूरा करने के लिए रेल-समुद्र-रेल कोयला निकासी रणनीति को बढ़ाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा रहा है।

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