जो जेहन पर असर छोड़ जाती है जिस कैफियत को हम भूला नहीं पाते।

रिपोर्ट :- शिवा वर्मा (संपादक)
बाराबंकी। खुमार बाराबंकवी की शायरी में हमें वह कैफियत नज़र आती है। जो जेहन पर असर छोड़ जाती है। जिस कैफियत को हम भूला नहीं पाते। खुमार साहब की शख्सियत और उनकी शायरी दोनों पहलूओं पर विचार विनिमय किया गया। खुमार की शायरी में गज़ल का जिक्र आया। उनकी शायरी में तरक्की पसंद का जिक्र आया। उन्होंने इश्कियां शायरी को जिन्दगी का बयान करने के लिए जिस तरह से इस्तेमाल किया। वह काबीले तारिफ़ है।
यह बात शहर के मुगल दरबार स्थित हाल में खु़मार मेमोरियल अकादमी द्वारा खुमार बाराबंकवी के यौमे पैदाइश के मौके पर ‘खुमार की शायरी व शख्सियत‘ सेमिनार की अध्यक्षता कर रहे प्रो. शारिब रूदौलवी ने कही। इससे पहले खु़मार मेमोरियल अकादमी के अध्यक्ष अमीर हैदर और सचिव उमेर किदवई ने खुमार अकादमी से जुड़े रहे जिले की तीन नामचीन शख्सियत खुमार बाराबंकवी, गयासुद्दीन किदवई और राजीव चौधरी के चित्र का लोकार्पण मुख्य अतिथि पूर्व सांसद जफ़र अली नकवी, पूर्व मंत्री अरविन्द कुमार सिंह गोप और विधायक सुरेश यादव से कराया।
प्रो. शारिब रूदौलवी ने आगे कहा कि आज इस महफिल में बहुत से नामचीन शायरों के नाम लिए गए। जिनके बगैर मुशायरे कामयाब नहीं होते थे। यहां से लखनऊ तक। फिर ऐसा क्यों है कि हमारे जेहनों से वह नाम निकल गए। यह बात बात अक्सर मेरे जेहन में उठती है। हमें खुमार की ज़बानी याद है। उसी ज़बान के अल्फाज़ दूसरे शायरों के याद नहीं है। ऐसा क्यों है? मैं यह समझता हूं कि शायरी सिर्फ अल्फाज़ का जोड़ नहीं है। अल्फाज़ के पीछे ख़्यालात और फ़िक्र की एक बड़ी दुनिया आबाद होती है। पहली निगाह में शेर सिर्फ अपने अल्फाज़ के जरिए पहुंचता है। अगर हम उनके लफ़्ज पर गौर करें तो हमें महसूस होगा कि आशिकाना शायरी आज शुरू हुई और खुमार साहब उसमें आए और उनको सोहरत मिली। जबकि आशिकाना शायरी मीर के जमाने से शुरू हुई। आज से नहीं शुरू हुई। मीर ने जब कहा कि दिल-ए-पुर-ख़ूँ की इक गुलाबी से, उम्र भर हम रहे शराबी से। वहीं दाग़ देलहवी ने जब कहा ‘कोई छींटा पड़े तो ‘दाग़‘ कलकत्ते चले जाएँ, अज़ीमाबाद में हम मुंतज़िर सावन के बैठे हैं। इश्कियां शेर दोनों है, लेकिन इश्क की सतह अलग है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व सांसद जफ़र अली नकवी ने कहा कि बाराबंकी बहुत ही अदबी और मोहब्बती जिला है। यहां हर फ़न में कोई न कोई मशहूर हस्ती रही है। उर्दू अदब में मज़ाज लखनवी, खुमार बाराबंकवी, सागर आज़मी, शारिब रूदौलवी ने खूब नाम कमाया। वहीं सियासत में जीमल उर रहमान किदवई, रफी अहमद किदवई, रामसेवक यादव सोहरत कमाई। खेल में के.डी सिंह बाबू ने विश्व में भारत का नाम रोशन किया। खुमार बाराबंकवी ने अपनी पूरी जिन्दगी शायरी के लिए वक्फ़ कर दी।
विशिष्ट अतिथि पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविन्द कुमार सिंह गोप ने कहा कि पूरी दुनिया खुमार बाराबंकवी के गीत और गज़ल को आज भी सुनती है। उनकी लिखी गज़ल हमारी धरोहर है। जिसे युवाओं और नई पीढ़ी को आत्मसात करना चाहिए। बाराबंकी साहित्यिक धरती है। इस धरती पर कई नामचीन साहित्यकार, गीतकार, खिलाड़ी, राजनेता पैदा हुए जिन्होंने तकलीफ़ भरा जीवन जीकर देश दुनिया में अपनी पहचान बनाई।
कार्यक्रम का आगाज़ खुमार बाराबंकवी के पोते फैज़ खुमार ने अपने दादा की लिखी हुई गजल से किया। कार्यक्रम का संचालन फजल इनाम मदनी ने किया। इस मौके पर विधायक धर्मराज सिंह उर्फ सुरेश यादव, डा इस्मत मलीहाबादी, डा अनवर खां, अख्तर जमाल उस्मानी, राजनाथ शर्मा, हशमत उल्ला, अमीर हैदर, शहाब खालिद, फराज़ किदवई, जतिन चौधरी, अनवर महबूब किदवई, परवेज अहमद, पत्रकार तारिक खान, पाटेश्वरी प्रसाद, हुमायूं नईम खान, आमिर रज़ा, नैययर जमाल, तौकीर जमाल, असद उल्ला किदवई, दीलिप गुप्ता, सुरेन्द्र प्रताप सिंह बब्बन, शोएब अनवर, डा अकमल अल्वी, डा मो. हफीज, राकेश त्रिवेदी, सईद उल हसन आदि थे।



