सोने को तापने पर वह समस्त मैल छोड़कर शुद्ध हो जाता है।

सोने को तापने पर वह समस्त मैल छोड़कर शुद्ध हो जाता है।
रिपोर्ट :- शिवा वर्मा।
दशलक्षण पर्व विशेष सप्तम दिवस- ‘‘उत्तम तप धर्म’’ इच्छा निरोध तप इच्छा का विरोध करना तप है। जिस प्रकार सोने को तापने पर वह समस्त मैल छोड़कर शुद्ध हो जाता है और चमकने लगता है। उसी प्रकार सांसारिक विषम-भोगो की अभिलाषा से विरक्त होकर अनादि कर्म बंध से सिद्ध स्वरूप निर्मल आत्मा को अनशनादि बारह प्रकार के तप से तपाकर कर्म रहित करना उत्तम तप हे। तप से कर्मों की निर्जरा होती है। क्षुल्लक श्री विगुण सागर जी पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर में उत्तम तप धर्म को भक्तों के बीच प्रवचन के माध्यम से बता रहे थे। प्रातः काल महावीर स्वामी का अभिषेक शांतिधारा व पूजन होने के बाद उन्होने कहा इच्छाओं को रोकना ही तप है। अन्तरंग व बहिरंग तपों के द्वारा आत्मा को शुद्ध किया जाता है। जिस प्रकार स्वर्ण तपकर ही शुद्ध बनता है, भोजन तपकर ही स्वादिष्ट बनता है, उसी प्रकार यह आत्मा तपधरण की साधना से परमात्मा बनता है। प्रवचन सभा का संचालन रमेश चन्द्र जैन तिलक ने किया। मुख्य रूप से दीप चन्द्र जैन, पवन कुमार जैन, प्रकाशचन्द्र जैन, नमन जैन, आदि उपस्थित रहें।

शाम की बेला में महाआरती के पश्चात् मंगलाचरण खुल जा सिम-सिम तथा धर्म लघु नाटिका का कार्यक्रम किया गया। जिसमें बरखा जैन, रेखा जैन, अनीता जैन, शीलू जैन आदि उपस्थित रही।




