
रिपोर्टर :- उज्जवल कुमार साहा
साहिबगंज। राजमहल में उत्तरवाहिनी गंगा तट पर माघी पूर्णिमा पर आदिवासियों का महाकुंभ का मेला लगा हुआ है,जहां धर्मगुरुओं के साथश्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई झारखंड, बिहार व बंगाल से पहुंचेआदिवासियों ने गुरु-शिष्य परंपरा और इष्ट देवों की आराधना के साथ सांझी संस्कृति का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया ।झारखंड के साहिबगंज जिले के राजमहल में उत्तरवाहिनी गंगा तट पर लगने वाला माघी मेला वर्षों से आस्था, परंपरा और सांझी संस्कृति का प्रतीक बना हुआ है।माघी पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित यह मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन-दर्शन का जीवंत उत्सव है। झारखंड ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और नेपाल से भी हजारों आदिवासी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।इसी व्यापक सहभागिता के कारण इस मेले को आदिवासियों का ‘महाकुंभ’ कहा जाता है।
शनिवार को श्रद्धालुओं ने किया गंगा स्नान
मंगलवार से ही आदिवासी साफा होड़ श्रद्धालु अपने-अपने धर्मगुरुओं के साथ उत्तरवाहिनी गंगा में आस्था की डुबकी लगाने लगे हैं।यह सिलसिला लगभग चार दिनों तक चलता है। पूर्णिमा मुहूर्त से पहले, पूर्णिमा के दौरान और उसके बाद भी श्रद्धालु गंगा स्नान करते हैं। स्नान के बाद घंटों सूर्योपासना, ध्यान और आराधना की जाती है।इसके उपरांत श्रद्धालु कांसे के लोटे में गंगा जल लेकर अपने अखाड़ों की ओर प्रस्थान करते हैं।मेला परिसर में लगे गुरु बाबाओं के अखाड़े इस आयोजन का सबसे विशिष्ट आकर्षण हैं।हर अखाड़ा एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में नजर आता है। जहां गुरु और शिष्य के बीच गहरा भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध दिखाई देता है।इन अखाड़ों में केवल आदिवासी ही नहीं, बल्कि गैर-आदिवासी श्रद्धालु भी बैठते हैं। राजमहल का यह मेला गुरु-शिष्य परंपरा का एक प्राचीन और अनोखा उदाहरण है।यहां गुरु बाबा अपने शिष्यों के शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्टों का निवारण अपनी विशिष्ट आध्यात्मिक शैली से करते हैं।शिष्य अपने गुरु के प्रति अपार श्रद्धा और विश्वास रखते हैं और अपना जीवन उनके मार्गदर्शन में समर्पित कर देते हैं।मांझी हड़ाम यानी शिव की गुरु पूजा करते हैं। त्रिशूल, तुलसी और शिव चित्र स्थापित कर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। साफा होड़ समुदाय के लोग शिव को अपने इष्टदेव के रूप में पूजते हैं और उनसे शांति, समृद्धि और संरक्षण का आशीर्वाद मांगते हैं।मंत्रोच्चारण की शैली भले ही संस्कृत या देवनागरी से अलग हो, लेकिन ‘ऊं’ के उच्चारण के साथ आस्था की गहराई स्पष्ट झलकती है।
विदिन होड़ समाज के लोग मांझी स्थान और जाहीर स्थान बनाकर पूजा करते हैं। जहां हर वर्ष विशेष अनुष्ठान संपन्न होते हैं।इन स्थानों पर सामूहिक पूजा, बलि-प्रथा से दूर प्रतीकात्मक अर्पण और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना प्रमुख रहती है।

मेला के दौरान आदिवासी समुदाय विशेष रूप से सादगी और संयम का पालन करता है। साफाहोड़ और विदिन होड़ आदिवासी इन दिनों सात्विक भोजन करते हैं।विशुद्ध सादा भोजन, ब्रह्मचर्य और अनुशासन उनके जीवन का आधार होता है।
सर्द भरी रातों में गुरु और शिष्य मिलकर अखाड़ा तैयार करते हैं। सूर्योदय से पहले ही सभी गंगा स्नान के लिए नदी में प्रवेश कर जाते हैं।घंटों की उपासना के बाद भीगे वस्त्रों में ही अनुष्ठान पूरे किए जाते हैं।यह कठोर साधना आस्था की गहराई और संकल्प की मजबूती को दर्शाती है।

