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सत्यधर्म और सत्यतीर्थ श्री कोटवा धाम दर्शन कोटवा धाम

कोटवाधाम बाराबंकी सप्तमी_व्रत_महा
तीरथ बरत तप त्याग दें, गगन रहो करि वास ।
जगजीवन अस जोग मत, कह सत शब्द प्रकाश।।
वों सत्यगुरु, जय सत्यनाम! महान संत जगजीवन साहब ने सृष्टि केंद्र सूर्य देव की जन्मदिन भानु सप्तमी (माघ शुक्ल सप्तमी) के दिन मानव शरीर धारण किया था। और सप्तमी के दिन ही आपका निर्माण भी हुआ था। संत जगजीवन साहब और सप्तमी व्रत ग्रंथ में वर्णित है कि आप इच्छा पुरुष थे।
पूर्व जन्म के पुण्य के कारण आपके जन्म के पश्चात से ही अलौकिक घटनाएं होती रही। 5 वर्ष की अल्प आयु में ही आपका जप और एकांत ध्यान प्रारंभ हो गया था। 7 वर्ष की आयु में आपने गुरु से मंत्र दीक्षा ली और साधना विधि सीखी फिर 12 वर्ष तक लगातार अजपा जप व सूरत ध्यान में डूबे रहे। ऐसे निर्लिप्त बिरागी संत जगजीवन साहब ने भी सप्तमी व्रत को सर्वाधिक महत्व दिया है। अब से ढाई सौ वर्ष पहले एक प्रसिद्ध महिला सतनामी भक्त हुई नाम था सोना देवी। उच्च ब्राह्मण कुल में पैदा हुई, संपन्न परिवार था। परंतु ईश्वर प्रेम की और इतनी मुडी की भाव भजन में डूबी रहती। तब भी मन को शांति ना मिल पाई। संत श्री जगजीवन साहब की प्रसिद्धि सुनकर उनके दर्शनों को गई। उस दिन पूर्णिमा थी। इसी कारण बहुत भीड़ भाड़ थी। सैकड़ों लोग “बड़े बाबा” को घेरे हुए थे। सोना ब्राह्मणी के मन में शंका हुई कि इतनी भीड़ भाड़ में ईश्वर चर्चा कैसे हो पाएगी। पालकी में ही बैठी रही। अंतर्यामी संत ने उनके मन की बात जान ली, और आदेश कहलाया की भक्ति भाव देखना है तो शिष्य संत देवीदास के पास जाएं। वो कोटवाधाम से चलकर 50 मील दूर पुरवा धाम में पहुंची। वहां पहुंचकर देखा कि संत देवीदास और भी अधिक व्यस्त थे। घर में कुछ कमरे बन रहे थे। वे उनका काम काज समझाते जाते, साथ में “अघविनाश” की हस्तलिखित प्रति भी तैयार कर रहे थे। साथ ही साथ जमीदारी के गांव के पटवारी से हिसाब पूछते हुए अजपा जप भी चला रहे थे। सोना ब्राह्मणी विरक्त भाव से आई थी। यहां भी उन्हें जंजाल लगने लगा और वह लौट जाने की सोचने लगी। संत श्री ने उनके मन की बात को जान लिया और अघविनाश पुस्तक को बंद कर प्रणाम किया। पटवारी को वापस भेजा और इकतारा उठाकर तत्काल रचित पद गाने लगे। उस पद में सोना ब्राह्मणी के पूर्व जीवन और उनके मनोभावों का वर्णन था। उसे सुनते ही सोना देवी को संत की महिमा का ज्ञान हुआ। और वह पालकी से कूदकर संत के चरणों में जा गिरी। उन्होंने संत देवीदास से मंत्र दीक्षा देने का अनुरोध किया। गुरु इच्छा जानकर संत देवीदास ने सोना ब्राह्मणी की प्रार्थना को स्वीकार कर ली, परंतु कहा कि नौकर-चाकर पालकी मंडली जो साथ लाई है उन्हें तत्काल वापस करो। और एकांत में रहकर “नाम साधना” करो। सोना देवी ने सभी को तत्काल लौटा दिया और गुरु चरणों में रहकर एक कुटिया में एकांत साधना करने लगी। कुछ माह साधना करने पर भी मन को शांति ना मिली तो उन्होंने फिर अपने गुरु से कृपा करने की अर्चना किया। संत देवी दास ने उन्हें बताया कि हे देवी तुम्हारा मन वर्षों से अशांत रहा है। जन्म-जन्मांतर के संस्कार दबे पड़े हैं। उनके निराकरण के लिए तुम साधना के साथ-साथ शुक्ल सप्तमी का व्रत करो। ज्योति और जीवन के दाता सूर्य ही सूर्य हैं। पृथ्वी मंडल में जीवन और उत्कर्ष के लिए उनकी कृपा आवश्यक है। सूर्य भगवान की संतुष्टि और कृपा के लिए केवल सप्तमी व्रत की महत्ता है। उसी को पूरी निष्ठा के साथ निरंतर करती रहो। तुम्हें मन को शांति और साधना में सफलता दोनों अवश्य मिलेगी। सोना ब्राह्मणी ने कहा कि गुरुदेव आपकी आज्ञा शिरोधार्य है परंतु एक शंका मन में उठ रही है कि परम गुरु जगजीवन साहब ने कहा है कि इस आदेश में व्रत ना करने पर फिर व्रत का महत्व क्यों? संत देवीदास ने उत्तर दिया अपने समाज में सैकड़ों व्रत बन गए हैं। सैकड़ों तीर्थ पैदा हो गए हैं। जिनकी मदद से कुछ लोग भ्रम पैदा कर कमाई कर रहे हैं। साधारण जनता समझने लगती है कि तीरथ बरत से ही सब पाप कट जाएंगे और जीवन में शुद्धता व सच्चाई लाने की कोई आवश्यकता नहीं। इसी भ्रांति को मिटाने के लिए परम गुरु ने तीर्थ व्रत का निषेध किया है। उन्होंने “सत्यमय जीवन और नाम साधना” को सर्वोपरि माना है। यही सतनाम पंथ का मूल लक्ष्य है। परंतु आदिगुरु जगजीवन साहब ने अपने ग्रंथ अघविनास के तीसरे व चौथे सुकमा में शुक्ल सप्तमी के निराहार व्रत का महत्व बताया है। यह पापनाशक शक्तिदायक और जीवन एक वृत्त है ।अघविनाश पढो सब भ्रम स्वयं समाप्त हो जाएंगे। यह अकेला व्रत है जो कि हमारा सतनामी पंथ सबसे अधिक मानता है। यह व्रत ज्योतिष स्वरूप सूर्य देव (आत्मा के देवता) से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए ही किया जाता है। दूसरा सतनामी व्रत पूर्णिमा का है जो कि चंद्रदेव (मन के देवता) से मन शांति के लिए किया जाता है। इन ब्रतो में आडंबर नहीं होना चाहिए। सूर्य और चंद्र दोनों ज्योतिर्मई प्रत्यक्ष देवता हैं। और प्रशिक्षण हमें प्रभावित कर रहे हैं। कहते हैं कि 1 वर्ष तक सोना ब्राह्मणी ने नाम साधना के साथ शुक्ल सप्तमी का व्रत किया। गुरु और सूर्य भगवान की कृपा से उन्हें परम ज्योति के दर्शन हुए। और वह अजपा जप में सिद्ध होकर सोना देवी से सोना दासी हो गई। कीरत सागर ग्रंथ में सोनादासी की साधना और उनकी अद्भुत शक्तियों के अनेक प्रकरण दिए गए है

जगजीवन जग आय कै, सत्यनाम की आस!
कोटवा-कोटिन तीरथ है, जगजीवन के पास!!

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