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बिना गुरु के मनुष्य चांडाल के समान अपवित्र होता है – देव मूर्ति महराज

रामसनेहीघाट, बाराबंकी । मनुष्य जीवन में गुरु का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है और बिना गुरु के मनुष्य चांडाल के समान अपवित्र होता है।गुरूदीक्षा लेने का कोई समय अथवा उम्र निर्धारित नहीं है और गुरूमंत्र बाल्यकाल से भी लिया जा सकता है।
यह बात क्षेत्र के ग्राम महुलारा में चल रही श्री लक्ष्मी महायज्ञ के छठे दिन अयोध्याधाम से पधारे कथा व्यास देवमूर्ति जी महराज ने
गुरु महिमा का बखान करते हुए कही। महराज श्री ने कहा कि गुरु दीक्षा लेने का कोई समय नहीं होता है और जरूरी नहीं है कि दीक्षा वृद्धावस्था में ली जाये।गुरु दीक्षा तो बचपन में ही ले लेनी चाहिए क्योंकि ध्रुव ने तो गर्भ में ही दीक्षा ग्रहण ले ली थी।गुरु मंच के महत्व पर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि बिना गुरु दीक्षा के नारद जी जब बैकुंठ धाम जाते थे तो उनके बेठने के स्थान को पवित्र किया जाता था लेकिन उन्हें इसका पता नहीं चलता था। जब एक दिन इसकी जानकारी नारद मुनि को हुयी तो उन्हें बड़ी आत्म ग्लानि हुयी।कथावाचक ने रूक्मिणी विवाह की चर्चा करते हुए समाज में फैली दहेज प्रथा को समाजिक अव्यवस्था का मूल कारण बताते हुये कहा कि दहेज से कोई व्यक्ति बड़ा नही नहीं होता बल्कि दहेज मांगने वाला भिखारी तुल्य होता है।उन्होंने कहा कि दहेज लेकर आने वाली बहू संस्कार लेकर नहीं बल्कि वह बहू रानी बनकर आती है।धनवान बहू के आने पर घर धन धान्य से नहीं बल्कि दुखों से परिपूर्ण हो जाता है और घर संस्कार विहीन हो जाता है और बड़ों का सम्मान नहीं बल्कि अपमान होने लगता है।
कथा व्यास ने भगवान शिव द्वारा शुरू की गई विवाह व्यवस्था का वर्णन करते हुए कहा कि रूक्मिणी एवं श्रीकृष्ण का विवाह नहीं बल्कि आत्मा का परमात्मा का मिलन है।उस मिलन में रूक्मिणी का भाई बाधक बना हुआ था इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को उसका घमंड तोड़ना पड़ा।इस मौके पर प्रदीप कुमार द्विवेदी, जीतेन्द्र तिवारी, केशवानंद, मनीराम तिवारी,कृष्ण कुमार यादव, प्रेस क्लब के अध्यक्ष रामबाबू मिश्र, संरक्षक वरिष्ठ पत्रकार भोलानाथ मिश्र, अजय तिवारी, शिवशंकर तिवारी आदि मौजूद थे।

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