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गांधीवादी चिन्तक राजनाथ शर्मा ने बढ़ी महंगाई, रेल निजीकरण के विरोध और किसान आन्दोलन के समर्थन में एकदिवसीय रखा उपवास

स्टेट हेड शमीम की रिपोर्ट

बाराबंकी। लोकतंत्र में सरकार कामों से बोलती है और विरोधी दल नारों से बोलते है। लेकिन यहां सरकारें नारों से काम कर रही है और विरोधी दल अपना काम कर रहे है। देश में गैस और पेट्रोल के दामों में जिस तरह केंद्र सरकार ने इजाफा किया है उसके बाद पूरे देश में हाहाकार मच गया है। आलम यह है कि लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर कर बढ़े हुए दामों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। इसी कड़ी में रविवार को नगर के गांधी भवन में गांधीवादी चिन्तक राजनाथ शर्मा ने बढ़ी महंगाई, रेल निजीकरण के विरोध और किसान आन्दोलन के समर्थन में एकदिवसीय उपवास रखा। शर्मा ने कहा कि सरकार व्यवसायीकरण के लिए नहीं है। बल्कि जनसेवा के लिए है। केन्द्र सरकार महंगाई पर काबू पाने में विफल रही है। खाद्यान्न, तेल, घरेलू गैस के दामों में दिनों दिन बढोत्तरी हो रही है। सरकार को जीवन उपयोगी इन वस्तुओं पर नियंत्रण करना चाहिए। चीजों के दाम बांधने चाहिए। डीजल और पेट्रोल के बढ़े दामों से किसान एवं आम आदमी परेशान है। यदि सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर कस्टम चार्ज और वैट को कम कर दे ंतो स्थिति सामान्य हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार यदि जनप्रतिनिधियों का वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं कम करे तो भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ करने में सहायता मिल सकती है। शर्मा ने कहा कि किसान आंदोलन दुनिया की एक बड़ी घटना बन चुका है। इस आन्दोलन के तीन महीने पूरे होने को है। उसके बावजूद यह आंदोलन नित नए अंदाज में रोज उफान पर रहा है। दुनिया का यह पहला जन आंदोलन है, जो इतनी बड़ी तादात में, इतने धैर्य के साथ अहिंसक और शांत मन से अपनी बात पर अडिग खड़ा है। सरकार को किसान की समस्याओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए और कृषि विधेयक को वापस लेना चाहिए। शर्मा ने बताया कि केन्द्र सरकार लगातार रेल का निजीकरण करने की योजना बना रही है। रेल मंत्रालय ने वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगों को मिलने वाले लाभ से वंचित रखा है। कोरोना का भय दिखा कर विशेष ट्रेनों का संचालन किया जा रहा है जबकि जिसमें यात्रियों को संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। इसके बावजूद रेल किराए में भी बढोत्तरी कर दी है। इससे यह प्रतीत होता है कि सरकार की कार्यशैली जनविरोधी और अलोकतांत्रिक है।

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